पिछले कामों में मुर्गी के अंडों का उपयोग इंसानों की रक्षा करने वाले प्रोटीन जमा करने के लिए होता रहा है। मिशूरी विश्वविद्यालय के नए अध्ययन ने ऐसी विधि प्रस्तावित की जिससे मुर्गियाँ अपने अंडों में अन्य उपयोगी चिकित्सा प्रोटीन लगातार उत्पन्न कर सकती हैं।
शोध ने एवियन आनुवंशिकी में आम समस्या, एपिजेनेटिक साइलेंसिंग, पर ध्यान दिया। जब वैज्ञानिक नया जीन मुर्गी के DNA में यादृच्छिक जगहों पर जोड़ते हैं, तो वह समय के साथ बंद हो सकता है और लाभ पीढ़ियों में नहीं टिकते। इस समस्या से बचने के लिए टीम ने CRISPR से जीन को जीनोम के एक विशेष स्थान, GAPDH पर रखा और उसमें हरा चमकने वाला रिपोर्टर जोड़ा ताकि सक्रियता देखी जा सके।
कई महीनों और कोशिका विभाजन के बाद रिपोर्टर जीन चमकता रहा, जो सकारात्मक परिणाम है। यह तरीका स्थिर आनुवंशिक रूप से संशोधित मुर्गियों की एक पंक्ति बनाने का रास्ता खोलता है। शोधकर्ता अन्य वैज्ञानिकों और उद्योग भागीदारों के साथ मिलकर उपयोगी संशोधनों को चुन रहे हैं। यह काम चिकित्सा के साथ कृषि और आर्थिक प्रभाव भी दे सकता है। शोध Poultry Science में प्रकाशित हुआ और इसका वित्तपोषण United States Department of Agriculture के National Institute of Food and Agriculture ने किया।
कठिन शब्द
- एपिजेनेटिक साइलेंसिंग — जीन की गतिविधि समय के साथ बंद होना
- जीन — ठोस आनुवंशिक सूचना वाला DNA का भाग
- जीनोम — किसी जीव का पूरा आनुवंशिक सामग्री संग्रह
- रिपोर्टर — जीन की सक्रियता दिखाने वाला संकेतक
- संशोधित — मूल रूप में बदल कर बनाया हुआ
- कोशिका विभाजन — एक कोशिका के दो भागों में बँटना
- वित्तपोषण — किसी काम के लिए पैसा देना
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चर्चा के प्रश्न
- अगर मुर्गियाँ लगातार चिकित्सा प्रोटीन बना सकें, तो यह किसानों और पशुपालकों के लिए कैसे उपयोगी हो सकता है?
- ऐसे आनुवंशिक प्रयोगों से जुड़े कौन से नैतिक या सामाजिक प्रश्न सामने आ सकते हैं?
- वैज्ञानिक और उद्योग भागीदार मिलकर किस तरह के उपयोगी संशोधनों को चुनना चाहिए और क्यों?