एक बहु-विश्वविद्यालय अध्ययन ने स्मार्टफोन ऐप और टेक्स्ट-आधारित व्यक्तिगत कोचिंग का परीक्षण किया। इस परीक्षण में 6,200 से अधिक विश्वविद्यालयी छात्रों ने भाग लिया और अध्ययन Nature Human Behavior में प्रकाशित हुआ। ऐप में डिजिटल रूप में संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT) मौजूद है; उपयोगकर्ता संकेतों का उत्तर देते हैं और मनोशैक्षिक मॉड्यूल पूरा करते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि जिन छात्रों को ऐप दिया गया, उन्होंने छह सप्ताह, छह महीने और दो साल के बाद कम लक्षण बताए। इन छात्रों में किसी भी मानसिक स्वास्थ्य विकार से मुक्त होने की संभावना उन छात्रों की तुलना में अधिक थी जिन्हें केवल कैंपस सेवा के लिए रेफ़रल दिया गया था।
शोधकर्ताओं ने बताया कि ऐप में जनरेटिव AI नहीं है और उन्होंने स्पष्ट किया कि डिजिटल उपकरण काउंसलिंग सेवाओं की जगह लेने के लिए नहीं हैं। उनका उद्देश्य बाधाओं को हटाकर साक्ष्य-आधारित देखभाल अधिक छात्रों तक पहुँचाना है। यह कार्य National Institute of Mental Health द्वारा समर्थित था और NIH द्वारा आंशिक रूप से वित्तपोषित किया गया।
कठिन शब्द
- बहु-विश्वविद्यालय — एक से अधिक विश्वविद्यालयों का सम्मिलित काम
- संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी — सोच और व्यवहार बदलने वाली मनोचिकित्सा
- मनोशैक्षिक — मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा शैक्षिक पहलू
- लक्षण — बीमार या तनाव में दिखने वाली समस्या
- रेफ़रल — किसी सेवा के लिए भेजने की सिफारिश
- बाधा — कोई कठिनाई या रोक जो पहुँच रोकती हैबाधाओं
- साक्ष्य-आधारित देखभाल — वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित स्वास्थ्य सेवा या उपचार
- जनरेटिव AI — सामग्री बनाने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक
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चर्चा के प्रश्न
- क्या आप सोचते हैं कि डिजिटल ऐप्स से अधिक छात्रों तक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पहुँच सकती है? क्यों या क्यों नहीं?
- आपके विचार में विश्वविद्यालयों में किस तरह की बाधाएँ विद्यार्थियों को काउंसलिंग तक पहुंचने से रोकती हैं? उदाहरण दें।
- यह सुनिश्िचत करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं कि डिजिटल टूल काउंसलिंग सेवाओं के पूरक बने, प्रतिस्थापित न करें?