इस अध्ययन में बताया गया है कि न्यूरॉन्स बाहर एक किस्म का किनेस (enzyme) VLK छोड़ते हैं जो न्यूरॉन्स के बीच की जगह में जाकर अन्य कोशिकाओं की बाहरी सतह पर मौजूद प्रोटीनों को फोस्फोराइलेशन के जरिए संशोधित करता है। ऐसे बाह्य-कोशिकीय संशोधन प्रोटीनों के बीच की अंतःक्रियाओं को बदलकर दर्द संकेतों को सक्रिय या नियंत्रित कर सकते हैं।
माउस प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने पाया कि VLK ने एक ऐसे रिसेप्टर के काम को बढ़ाया जो दर्द, सीखने और स्मृति से जुड़ा है। जब VLK को दर्द-संवेदक न्यूरॉन्स से हटा दिया गया, तो पशुओं ने सर्जरी के बाद सामान्य दर्द की अनुभूति नहीं दिखाई, पर उनकी चलने-फिरने और सामान्य संवेदनशीलता बरकरार रही। इसके विपरीत, अतिरिक्त VLK जोड़ने से दर्द प्रतिक्रियाएँ बढ़ीं।
लेखकों का कहना है कि VLK जैसे बाह्य-कोशिकीय एन्ज़ाइमों को लक्षित करने से दर्द मार्गों को नियंत्रित करने का एक सुरक्षित विकल्प मिल सकता है, क्योंकि यह सीधे NMDA रिसेप्टरों को ब्लॉक करने की आवश्यकता से बचा सकता है। NMDA रिसेप्टर तंत्रिकीय संचार को नियंत्रित करते हैं और सीधे ब्लॉक करने पर गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। बाहरी प्रोटीनों को नियंत्रित करने से दवा डिजाइन सरल हो सकता है और ऑफ-टारगेट प्रभाव कम रह सकते हैं।
अगला कदम यह जांचना है कि यह तंत्र कितने प्रोटीनों पर लागू होता है — कुछ पर ही या व्यापक रूप से। यदि यह व्यापक है, तो न केवल दर्द बल्कि अन्य तंत्रिका संबंधी रोगों के उपचार के दृष्टिकोण भी बदल सकते हैं। इस अध्ययन का नेतृत्व Matthew Dalva और Ted Price ने किया और यह Science में प्रकाशित हुआ; इसमें कई विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता शामिल थे और अध्ययन को NIH से मिलने वाले अनुदानों ने समर्थन दिया।
कठिन शब्द
- किनेस — प्रोटीन पर रासायनिक समूह जोड़ने वाला एन्ज़ाइम
- फोस्फोराइलेशन — प्रोटीन में फॉस्फेट समूह जोड़ने की क्रिया
- बाह्य-कोशिकीय — कोशिका के बाहर स्थित या उससे संबंधित
- संशोधन — मौलिक संरचना या गुण बदलने की प्रक्रिया
- रिसेप्टर — कोशिका की सतह पर संकेत स्वीकार करने वाला प्रोटीनरिसेप्टरों
- लक्षित करना — किसी जैविक लक्ष्य पर दवा या उपाय लगानालक्षित करने
- अंतःक्रिया — दो या अधिक प्रोटीन के बीच क्रियात्मक संपर्कअंतःक्रियाओं
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चर्चा के प्रश्न
- यदि यह तंत्र कई प्रोटीनों पर लागू होता है, तो दर्द और अन्य तंत्रिका संबंधी रोगों के इलाज में क्या बदलाव आ सकते हैं? अपने विचार बताइए।
- बाह्य-कोशिकीय एन्ज़ाइमों को लक्षित करने वाली दवा बनाते समय कौन‑सी सावधानियाँ जरूरी हो सकती हैं? उदाहरण दें।
- बाहरी प्रोटीनों को नियंत्रित करने से ऑफ-टारगेट प्रभाव कम होने की संभावना क्यों हो सकती है? अपनी राय लिखिए।
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